Friday, 21 October 2016

          भरत और बूढ़ी भिखारिन

                     Mexican-Beggar-web

एक भिकारिन की कथा, जिसकी गरिमा ने हैरान कर दिया ।
रत को अक्सर पोस्ट ऑफिस जाना पड़ता था। एक बूढ़ी भिखारिन उस पोस्ट ऑफिस के परिसर में लेटी रहती थी। पोस्ट ऑफिस में घुसने से पहले सार्वजनिक फोन बूथ के पास से ही उसके गंदे कपड़ो की बदबू आती थी। वो सोती नहीं थी तो बड़बड़ाती रहती थी ।

 जब पोस्ट आफिस शाम छ: बजे बंद होने लगता, तो उस बूढ़ी भिखारिन समेत दूसरे आश्रय-विहीन लोगों को वहां से बाहर निकाल दिया जाता।  ऑफिस से निकाले जाने के बाद वह भिखारिन फुटपाथ पर लेट जाती थी। बाहर खुली हवा के कारण उसके पास से बदबू कम आती थी।
 एक दिन अपने जन्मदिन पर उसके यहां बहुत सारा खाना बच गया । वह रात काफी सर्द थी । भरत खाना पैक करके कार से उस सड़क पर पहुँच गया जहां वह बदनसीब बुढ़िया रात को सोती थी। पत्तियां सड़क पर उड़ रही थीं और भरत को पूरी उम्मीद थी कि वह बूढ़ी बदनसीब उसको मिल जाए। आखिरकार वह उसको दिख गई।। उसने वहीं कपड़े पहन रखे थे ,,जो वह हमेशा पहनती थी । गर्मियों में भी उसका बूढ़ा और झुका हुआ शरीर गर्म ऊन की परतों से छिपा हुआ था । अपने दुबले-पतले हाथों से उसने डलिया पकड़ रखी थी । वह पोस्ट ऑफिस के पास वाले खेल के मैदान के सामने तार की बाड़ को पकड़ कर खड़ी थी। भरत ने सोचा कि वह ऐसा जगह क्यों नहीं चुन लेती जहां उसको कम हवां लगे ।। उसे लगा कि शायद हवा से बचने का उपाय उसके दिमाग में कभी आया ही ना हो।

भरत ने अपनी कार रोड़ के किनारे खड़ी कर दी और खिड़की खोलकर कहा अम्मा..क्या आप....। तभी वह सोच में पड़ गया कि अचानक उस बूढ़ीं औरत के लिए उसके मुंह से अम्मा क्यों निकला । लेकिन ना जाने क्यों वह भिखारिन उसको अम्मा जैसी ही लग लग रही थी। 
अम्मा ने एक बार फिर कहां कि अम्मा मैं आपके लिए खाना लाया हूँ क्या आप खाना पसंद करेंगी ? यह सुनकर उस बूढ़ी भिखारन ने भरत की ओर हैरानी से देखा और फिर उसके होठ हिले और वह बहुत स्पष्टता से बोली- अरे बेटा तेरा बहुत-बहुत घन्यवाद कि तू मेरे लिए खाना लेकर आया लेकिन अभी मेरा पेट भरा है,, तू किसी दूसरे जरूरतमंद को ये खाना क्यों नहीं दे देता ???

उसके शब्द स्पष्ट थे और उसका व्यवहार गरिमापूर्ण था । फिर उसने भरत को जाने की इजाजत दे दी और अपना सिर एक बार फिर चीथड़ों में छिपा लिया । भरत हैरान नजरों से उसे काफी देर तक टकटकी लगाए देखता रहा।

संतोष से बढ़कर जीवन में कोई सुख नहीं होता है ।

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