Sunday, 23 October 2016

कदम तो राखो काशी में तर जाओगे काशी में

      कदम तो राखो काशी में तर जाओगे काशी में 


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रंग, भंग और उमंग की नगरी काशी । नित नए उत्सवों , महोत्सवों की काशी । सबको अपना मानने वाली काशी । हजारों रंगो से सराबोर काशी । विश्व की सर्वाधिक पूजनीय नगरी काशी । त्रिशूल पर विराजित काशी ।

              काशी के तो हजारो रंग है जो जिस भावना से काशी को देखता है,, उसको काशी वैसी ही नजर आती है । रामचरितमानस में एक चौपाई  है,, । जाकी रही भावना जैसी , हरि मूरत देखी तिन तैसी
जिसने जिस नजर से काशी को देखा उसको काशी वैसी ही नजर आई,,।
किसी ने काशी को रंग की, तो किसी ने भंग की तो किसी ने उमंग की नगरी कहा ।

काशी को जीतना बहुत आसान है, लेकिन दिल से , सत्य से , प्रेम से , करूणा से,। लेकिन यदि काशी को बल, छल-कपट से जीतना चाहेंगे तो आपका हाल औरंगजेब और रजिया सुल्तान जैसा ही होगा।

जिन्होने काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाकर काशी की अस्मिता को ठेस पहुचानें की पूरी कोशिश की लेकिन काशी की वो कशिश आज भी विद्यमान है ।
काशी तो वो नगरी है जिसने शास्त्रार्थ में शंकराचार्य को भी परास्त किया है।

     काशी में आकर हम काशी की छवि को निहारने में इतने सरावोर हो जाते है खुद कि छवि भी भूल जाते है,, खूसरो कहते है ना कि, अपनी छब बनाई के जो मैं पी के पास गई, छब देखी जब पिया कि तो मैं अपनी भूल गई ।

यही प्रार्थना है उस विधाता से कि काशी की दिव्यता, भव्यता, ओजस्विता ऐसे ही बनी रहे और काशी को निहारने वालों का काशी, को जीने वालों का मेला ऐसे ही लगा रहें।।

जय काशी
हर हर महादेव
भारत माता की जय  

Friday, 21 October 2016

विश्व भरण पोषण कर जोई, ताकर नाम भरत अस होई ।

          भरत और बूढ़ी भिखारिन

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एक भिकारिन की कथा, जिसकी गरिमा ने हैरान कर दिया ।
रत को अक्सर पोस्ट ऑफिस जाना पड़ता था। एक बूढ़ी भिखारिन उस पोस्ट ऑफिस के परिसर में लेटी रहती थी। पोस्ट ऑफिस में घुसने से पहले सार्वजनिक फोन बूथ के पास से ही उसके गंदे कपड़ो की बदबू आती थी। वो सोती नहीं थी तो बड़बड़ाती रहती थी ।

 जब पोस्ट आफिस शाम छ: बजे बंद होने लगता, तो उस बूढ़ी भिखारिन समेत दूसरे आश्रय-विहीन लोगों को वहां से बाहर निकाल दिया जाता।  ऑफिस से निकाले जाने के बाद वह भिखारिन फुटपाथ पर लेट जाती थी। बाहर खुली हवा के कारण उसके पास से बदबू कम आती थी।
 एक दिन अपने जन्मदिन पर उसके यहां बहुत सारा खाना बच गया । वह रात काफी सर्द थी । भरत खाना पैक करके कार से उस सड़क पर पहुँच गया जहां वह बदनसीब बुढ़िया रात को सोती थी। पत्तियां सड़क पर उड़ रही थीं और भरत को पूरी उम्मीद थी कि वह बूढ़ी बदनसीब उसको मिल जाए। आखिरकार वह उसको दिख गई।। उसने वहीं कपड़े पहन रखे थे ,,जो वह हमेशा पहनती थी । गर्मियों में भी उसका बूढ़ा और झुका हुआ शरीर गर्म ऊन की परतों से छिपा हुआ था । अपने दुबले-पतले हाथों से उसने डलिया पकड़ रखी थी । वह पोस्ट ऑफिस के पास वाले खेल के मैदान के सामने तार की बाड़ को पकड़ कर खड़ी थी। भरत ने सोचा कि वह ऐसा जगह क्यों नहीं चुन लेती जहां उसको कम हवां लगे ।। उसे लगा कि शायद हवा से बचने का उपाय उसके दिमाग में कभी आया ही ना हो।

भरत ने अपनी कार रोड़ के किनारे खड़ी कर दी और खिड़की खोलकर कहा अम्मा..क्या आप....। तभी वह सोच में पड़ गया कि अचानक उस बूढ़ीं औरत के लिए उसके मुंह से अम्मा क्यों निकला । लेकिन ना जाने क्यों वह भिखारिन उसको अम्मा जैसी ही लग लग रही थी। 
अम्मा ने एक बार फिर कहां कि अम्मा मैं आपके लिए खाना लाया हूँ क्या आप खाना पसंद करेंगी ? यह सुनकर उस बूढ़ी भिखारन ने भरत की ओर हैरानी से देखा और फिर उसके होठ हिले और वह बहुत स्पष्टता से बोली- अरे बेटा तेरा बहुत-बहुत घन्यवाद कि तू मेरे लिए खाना लेकर आया लेकिन अभी मेरा पेट भरा है,, तू किसी दूसरे जरूरतमंद को ये खाना क्यों नहीं दे देता ???

उसके शब्द स्पष्ट थे और उसका व्यवहार गरिमापूर्ण था । फिर उसने भरत को जाने की इजाजत दे दी और अपना सिर एक बार फिर चीथड़ों में छिपा लिया । भरत हैरान नजरों से उसे काफी देर तक टकटकी लगाए देखता रहा।

संतोष से बढ़कर जीवन में कोई सुख नहीं होता है ।

Tuesday, 18 October 2016

    सर्कस का उत्साह और पिता की नेकी

     


यह काजल की कहानी है,जिसने सर्कस के बदले कुछ और देखा
काजल सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसके पिता एक चीनी मिल में इंजीनियर थे। उन्हें अपनी बेटी के साथ रहने का काफी कम समय मिल पाता था। उस दिन रविवार था और शहर में सर्कस लगा हुआ था। काजल ने कभी भी सर्कस नहीं देखा था, औऱ वो कई दिनों से अपने पिता से सर्कस दिखाने की जिद कर रही थी। उस दिन उसके पिता का अवकाश था। इसलिए अपनी बेटी का मन रखने के लिए वो उसको सर्कस दिखाने लेकर गए।

काजल के पिता टिकट खरीदने गए तो काजल भी अपने पिता के साथ टिकट खिड़की के समीप ख़ड़ी थी,,।। उनके पास ही एक बड़ा सा परिवार भी खड़ा था,, जिसमें दो लड़कियां और छ: लड़के थे। उनके माता पिता सबसे आगे एक दूसरे का हाथ पकड़ कर खड़े थे। उनको देखकर साफ कहा जा सकता था कि वे एक दूसरे की ताकत थे। सभी बच्चें सर्कस देखने के लिए काफी उत्साहित थें। और उनकी बातों से साफ लग रहा था कि वे भी काजल की तरह ही पहली बार सर्कस देखने आए है। कोई कह रहा था कि जोकर हाथी को चलाता है तो कोई कह रहा था कि जोकर सिर्फ साईकिल चलाता है। काजल और उसके पिता उनकी बातें सुनकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

आखिरकार टिकट खिड़की पर उनकी बारी आ ही गई। आठ बच्चों के पिता ने कहा आठ बच्चों के और छ: और दो बड़ो के । खिड़की पर खड़े शख्स ने पैसे बताए। पैसे सुनते ही बच्चों काी मांँ  ने पिता का हाथ छोड़ दिया । वह परेशान अपने पति की ओर देखने लगीं। पिता ने एक बार फिर से लेकिन इस बार थोड़ी मायूस आवाज में पूछा जी कि.. कितना बताया  ’? एक बार फिर काउंटर पर बैठे शख्स से पैसे बताए। पिता का मुँह उतर गया।

 वह पलटकर अपने बच्चों की तरफ देखने लगा और सोचने लगा कि उन्हें कैसे बताए कि उसके पास पैसे कम है। काजल के पिता ने काजल की तरफ देखा और धीरे  से सौ रूपए का नोट पास में जमीन पर गिरा दिया। ऐसा  कतई नहीं था कि उनके पास बहुत पैसे थे। लेकिन उन बच्चों की खुशी के मोल को आगे पैसों का मोल कम पड़ गया था। काजल के पिता उन बच्चों के पिता से बोले कि शायद आपके कुछ पैसे गिर गए है।  ’बच्चों के पिता समझ गए ।

उन्होनें वह नोट उठाया और काजल के पिता का हाथ पकड़कर उनकी तरफ रूआंसी आंखो से देखते हुए बोले ‘  शुक्रिया काजल और उसके पिता मुस्कराते हुए वापस अपनी गाड़ी की तरफ लौट गए । काजल उस दिन सर्कस तो नहीं देख पाई लेकिन उस दिन जो उसने देखा, वह उसके जीवन की अब तक की सबसे बड़ी सीख थी।



खुशियां दूसरों के साथ बांटने से और बढ़ जाती हैं ।।

Tuesday, 11 October 2016

दर्द खत्म नही होता।

अनुभूतियां कभी खत्म नही होतीं,, चाहे वो अच्छी हो या बुरी... जो यादें जो लोग एक बार जहन में, दिल में, मन में जगह बनाने में सफल हो जाते हैं।। उनको भूलना असंभव सा लगता हैं,, ।। कोई कितना भी कठोर दिल क्यों ना हो अगर उसका सच में किसी से सच्चा लगाव है, तो वो उससे बिछड़ने की बातों को सोचकर ही पागल सा होने लगता है,, और अगर उसके सामने वाला भी ठीक उसी प्रकार उसके लिए पागल हो तो उन दोनों के लिए एक दूसरे को भूलना नामुमकिन हैं।।
लेकिन समय और परिस्थितियां ना जाने कब किसको किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दें, एक ऐसै मोड़ जहां पर उसको उन सारी परिस्थितियों का सामना करना पड़े जिसके बारे में वो सोच भी नहीं सकता था,,।. समय सबसे बलवान होता हैं,, ये बात तो सच है लेकिन समय के साथ चलते हुए भी लोग साथ-साथ रह सकते हैं।। लेकिन अगर किसी का साथी समय के साथ ना चल पाया तो दूसरा उसका हाथ बीच राह में ही छेड़ दे से कहां का न्याय है?
किसी के जीवन भर साथ निभाने की कसम खाने के बाद उसको तड़पने, रोने, धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ देना कहा का न्याय हैं??  मेरा मन किसी पर भी उंगली उठाने का नहीं है लेकिन एक सवाल उससे जरूर है कि जो कभी किसी को उदास भी नहीं देख सकता था, आज ये जानते हुए भी कि उसके चेहरे की प्यारी सी मुस्कान हमेशा के लिए खत्म हो चुकी हैं।। वो खुद भी खत्म हो चुका है।
सिर्फ और सिर्फ दूसरो को ये दिखाने के लिए कि आप की वजह से वो पागल नहीं हुआ है, कभी कभी मुश्कुरा देता हैं,, उसको ये हाल जानकर आपके मन में पीड़ नहीं होती दु:ख नहीं होता।।
बेशक आपका जवाब ना हो लेकिन अगर आप आज जिस किसी के भी साथ हो तो ये सोच लेना कि जो बदलाव आपका अपना पुराने प्यार के प्रति आया है वो क्या इस नए प्रेमी के लिए नहीं आएगा,,क्या इसकी भी सिर्फ एक गलती पर आप उसको भी नहीं हमेशा के लिए नहीं छोड़ दोगे????

Friday, 7 October 2016

नवरात्रि का रहस्य

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        नवरात्रि का रहस्य

नवरात्र शब्द से नव आहोरात्रों (विशेष रात्रियों) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नवरूपों की उपासना की जाती  है। रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। भारत के प्राचीन ऋषि मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है इसलिए दीपावली, होलिका,शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परम्परा है। यदि रात्रि का कोई विशेष महत्व न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कहकर दिनही कहा जाता लेकिन नवरात्र के दिन,नवदिन नहीं कहे जाते। मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार ठीक छ: मास बाद अश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतीपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी  के एक दिन पूर्वतक । परन्तु सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है।

इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं।

Thursday, 6 October 2016

सच्चा नास्तिक कौन है????

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आजकल नया फैशन चला है 

,, अपनी संस्कृति और संस्कारों और धार्मिक गतिविधियों को फालतू बताने का ,, मुझे समझ नहीं आता कि इन सारी चीजों को फालतू कहने वाले यह क्यों भूल जाते है कि जब उनका जन्म हुआ था , तो सारी वैदिक रीतियों का पालन हुआ था ,, 
नामकरण से लेकर अन्नप्राशन , यज्ञोपवीत संस्कार से लेकर विवाह संस्कार और अंत काल में जब इनके वश में कुछ भी नही रहेगा फिर भी इनका अंतिम संस्कार ही होगा।।

राम पर लांछन लगाना, सीता के चरित्र पर सवाल उठाना,, कृष्ण को गलत कहना, हनुमान जी के कृत्यों को काल्पनिक बताना और शिव को भी सम्मान ना देना,,
अगर वो खुद नास्तिक है तो यहाँ तक तो कुछ समझा जा सकता है, लेकिन ये उन लोगों को भी नहीं खुशी से नहीं देख सकते है, जो इनकी तरह अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्करों को भूले नहीं है,, जो सूर्य भगवान को नमस्कार करते है, मां गंगा को पूजते है, शिव की स्तुति करते है, राम को स्मरण करते रहते है और कृष्ण के वंशज होने पर खुद पर गर्व करते है।।


अगर भगवान को ना मानने वाले लोग, भारत को मात्र एक भूमि का टुकड़ा समझने वाले लोग, हिंदुस्तान को कुछ भी ना समझने वाले लोग और वे लोग जो भारत का जन्म 15 अगस्त 1947 को मानते है और हमेशा पूजापाठ, नाम जप. स्मरण , मंदिर जाने का विरोध करके खुद को नास्तिक कहलाना पसंद करते है और कुछ ज्यादा ही खुश होते है, ये देख कर कि आज मैनें देश के संस्कारों , राष्ट्र की सभ्यताओं और भारत की संस्कृति पर सवालिया निशान खड़ा किया और कुछ आस्तिकों को नाश्तिक बना दिया।।


ऐसे लोगों से  सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि कबीर और वाल्मीकि से बड़ा नास्तिक कोई नही था,, लेकिन इन्होनें जब उस परम सत्य को जाना तो इनसे बड़ा आस्तिक कोई नही हुआ आजतक,, तो आप सभी नास्तिकों से  सिर्फ और सिर्फ एक बात कहना चाहूंगा कि अगर आप नास्तिक है तो सबसे पहले नास्तिक की परिभाषा का ज्ञान कर लीजिए जो इस प्रकार है----- एक सच्चा नास्तिक वही होता जो एक सच्चा आस्तिक होता है, और हर चीज को जांचने और परखने के बाद ही कहता है कि ये गलत है या ये झूठ हैं,,

तो आप सभी से निवेदन है कि अगर आस्तिक है तो सच्चे आस्तिक रहिए और अगर सच्चे नास्तिक है तो सच्चे नास्तिक रहिए और पहले खोज करिए विधाता की
अगर सच्चे मन से ढ़ूढ़ंने पर भी श्याम ने मिले तो एक बार ये मान लीजिए कि एक परमशक्ति है जो इस सारे संसार को संचालित करती है और उससे बड़ा कोई भी नहीं है,, 
क्यों कि बिना माने तो गणित का सवाल भी हल नहीं होता और आप तो परमशक्ति की खोज में है।।

जानने के लिए मानना जरूरी हैं।।

जय श्रीराम, भारत माता की जय ,,
वंदे मातरम्










Friday, 23 September 2016

छात्रसंघ जरूरी है

                                                              छात्रसंघ जरूरी है

                                  



आजकल कई लोग कहने लगे है, छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए ,, न जाने क्या सोचते है ये लोग?
लेकिन जितना मुझे समझ में आता है,

 यदि छात्र राजनीति से दूर रहे होते तो,, देश को विश्व के इतिहास का सबसे बड़ा और सफतलम और सम्माननीय क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद न मिलते, क्यों कि अगर कोई चंद्रशेखर आजाद के बारे में थोड़ा सा भी जानता होगा उसे ये जरूर ज्ञात होगा कि चंद्रशेखर आजाद अपने छात्र जीवन से ही राजनीति में बहुत सक्रिय थे , और ये मेरा सौभाग्य है कि जिस पावन स्थल से चंद्रशेखर आजाद ने शिक्षा ग्रहण  की उसी जगह से मैं भी पढ़ाई कर रहा है,, वो पावन स्थल है महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय,
न जाने कितने राजनेता काशी विद्यापीठ से शिक्षा ग्रहण कर देश की राजनीति में सक्रिय रहे,,

 लाल बहादुर शास्त्री जी जिन्होनें न सिर्फ देश का सबसे सफलतम नेतृत्व किया बल्कि अपने छोटे से कार्यकाल में ही देश में एक नई उर्जा का संचार करने में सफल रहे। यदि छात्र राजनीति से दूर रहे होते तो देश को देश के वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह न मिलते,, बिहार को लालू प्रसाद यादव न मिलते,, बिहार के यशस्वी नेता नीतीश कुमार न मिलते ,, रविशंकर प्रसाद न मिलते ,, सुशील मोदी न मिलते और देश में वैचारिक क्रांतियों को आधार न मिलते।। आगे और भी अनेको उहाहरण दे सकता हूँ लेकिन आप सभी समझदार है ,,

इसलिए सकारात्मक राजनीति में सक्रिय रहिए,, देश के प्रति समर्पित रहिये खुश रहिये,
जय हिंद जय भारत
जय काशी विद्यापीठ

छात्रसंघ

         छात्रसंघ जरूरी है, मतदान जरूर करिये
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जी हां राजनीति में छात्रों की सहभागिता बहुत ही जरूरी हैं,, क्यों कि अगर छात्र राजनीति में आते है तो देश को महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद मिलता है, अगर छात्र राजनीति में दखल रखते हैं तो देश को नितीश कुमार, रामकृपाल यादव, लालू प्रसाद यादव, रविशंकर प्रसाद, सुशील मोदी और देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी , पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर , देश  के वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री संपूर्णानंद जैसे नेता मिलते हैं ।।

इसलिए छात्र हित में मतदान करिये, राष्ट्रहित में मतदान करिये और उस ताकत का इस्तेमाल जरूर करिये जो आपको मिली हैं, वोट करने की ताकत

Sunday, 28 August 2016

काशी विद्यापीठ ( विद्या का सिद्धपीठ )

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मैं खुद को बहुत ही सौभाग्यशाली समझता हूँ, कि मुझे एक ऐसे विश्वविद्यालय( महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ) में शिक्षा ग्रहण करने का अवसर प्राप्त हुआ, जिसके कण-कण में देश के प्रति सम्मान और देशप्रेम निहित हैं।।
राष्ट्र को समर्पित यह संस्था जिसके प्रांगण में विश्व का इकलौता और सबसे अनोखा मंदिर हैं, जो किसी धर्म का परिचायक नहीं है,अपितु संपूर्ण भारत की एकता और अखंडता को अभिव्यक्त करता हैं।।
एक ऐसा विश्वविद्यालय जिसके कुलगीत को पढ़ भर लेने से  राष्ट्रप्रेम की एक ऐसी लहर मन में दौड़ उठती हैं, कि उसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन हैं।।
काशी विद्यापीठ में शिक्षा ग्रहण करने के बाद मैं अपने जीवन में क्या करूंगा, ये तो भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना जरूर जानता हूँ,, कि राष्ट्र के प्रति समर्पण की जो प्रेरणा और सीख यहां मिली हैं उसको कभी भी विस्मरण नहीं करूंगा।।
आप सभी के लिए अपने विश्वविद्यालय का कुलगीत साझा कर रहा हूँ,, जय हिंद
                     कुलगीत  
विद्या के सिद्धपीठ जय महान, हे! जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे!
 भारत की भव्य भारती के स्वर तुम!  राष्ट्रभावना  के संदेश मुखर तुम!
      बलिदानों के गुरूकुल महाप्राण हे ! जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे !
          हे अभिनव भारत के भाग्य विधाता ! कोटि-कोटि जनता के मुक्ति प्रदाता !
जन-गण को करते नेतृत्व-दान हे !जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे!
ऋषियों  की  वाणी के तुम  व्याख्याता !  नूतन   विद्याओं  के  अनुसंधाता !
          आत्मा  के शिल्पी  संकल्पवान  हे ! जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे !
          गांधी के गरिमा से ओत-प्रोत तुम! शिवप्रसाद की विभूति, शक्ति-स्त्रोत तुम !
तुममें भगवानदास मूर्तिमान हे! जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे  !
कल्पना नरेन्द्रदेव की विराट तुम ! पुण्य भूमि भारत माँ के ललाट तुम !
          दे रहे समन्वय का दिव्य ज्ञान हे ! जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे !
    इस  विद्या-मंदिर  की  अमर   भारती ! राष्ट्रदेवता  की  कर  रही आरती !
ज्योतित हम दीपवर्तिका-समान हे! जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे!
सत्य अहिंसा के हे दृढ़ व्रतकारी ! युग-युग  तक अटल रहे मूर्ति  तुम्हारी !
      युग-युग तक विश्व करे कीर्ति गान हे! जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे!
   नभ  में लहरायें यह पुण्य पताक  !  जिस पर  है  चित्र टँका भारत माँ का !
शंभू  के  त्रिशूल-शलाका-प्रमाण हे ! जय-जय हे चिर नवीन चिर पुराण हे !  

अरूणाचल प्रदेश ( आलेख )

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पूरा पढ़ियें और जवाब जरूर दीजिए,,देश से जुड़ी बात हैं!

भारत का सबसे पूर्वी राज्य अरूणाचल प्रदेश ,,सूरज सबसे पहले किरणें इसी घरती को देता हैं, उसके बाद ही संपूर्ण भारतवर्ष में अपनी झटा बिखेरता हैं,,आज अरूणाचल प्रदेश की बात इसलिए कर रहा हूँ।
क्यों कि मैं एक तुलना करना चाहता हूँ , अरूणाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर की----
1-             दोनों ही राज्य सीमावर्ती हैं।
2-             दुर्गम हैं।
3-             सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।
4-             दोनों ही राज्यों पर हमारे दुश्मन देश की नजर हैं।
ये चार चीजें तो समान हैं दोनो राज्यों में लेकिन कई ऐसी चीजें भी हैं जो कि बिल्कुल अलग हैं—
1-             सरकार जितना धन जम्मू और कश्मीर पर खर्च करती है,, उतना अरूणाचल प्रदेश पर नहीं करतीं।।
2-             जम्मू और कश्मीर में रेल और रोड नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में काफी काम हो रहा है,, जबकि अरूणाचल प्रदेश के विकास को लेकर सरकार उतनी गंभीर नहीं हैं।।
3-             जम्मू और कश्मीर पर पाकिस्तान की नापाक नजर हैं तो अरूणाचल प्रदेश पर चीन की,, पाकिस्तान कश्मीर पर कब्जा कर भारत के लिए नई मुसीबत खड़ी करना चाहता है तो चीन अरूणाचल प्रदेश को जीतकर अपना विस्तार भूटान तक करना चाहता हैं।।
4-             भारत सरकार कश्मीर पर इतना पैसा खर्च करती है और कश्मीर से देश को क्या मिलता है सिर्फ और सिर्फ धोखा, गोलियां, आतंकवादी हमले और भीतरघात,,,
लेकिन अरूणाचल प्रदेश के लोगों को आजतक कभी भी भारत विरोधी नारें लगाते या सेना पर हमला करते नहीं देखा होगा।।
वहां के लोगो के सामने चमकता हुआ चीन हैं,,जहां उन्हें हर सुविधा मिल सकती हैं,, और चीन हमेशा से ही वहां के लोगों को ऐसे प्रलोभन देता भी रहता है,, लेकिन ऐसा क्या है कि सरकार की बेरूखी और चीन के प्रलोभनों के बावजूद अरूणाचल प्रदेश के लोग मजबूती से अपने देश के साथ खड़े हैं और कश्मीर के लोग हाथों में पत्थर और पिस्तौल लिए अपने ही देश के खिलाफ खड़े हैं।।
मुझे समझ नहीं आता कि ये घिनौनी सोच आई कहा से है इन कश्मीर के दंगाईयों में ,,, ।
एक सवाल और मन को परेशान करता है कि इतनी परेशानियों के बावजूद, विकास न होने के बावजूद,
चीन के डर, भय और लालच के बावजूद भी अरूणाचल प्रदेश देश के साथ हैं और चीन का डटकर मुकाबला कर रहा हैं। जवाब तो मुझे आजतक मिला नहीं कि अरूणाचल के लोगों में इतना देशप्रेम हैं,, वहीं कश्मीरीयों के मन में इतना देशद्रोह।।
शायद DNA में ही गढ़बढ़ हैं कश्मीरियों के भारत के लोगो के मेल नहीं खाता,, अगर उनकी रगों में भी भारतीय खून होता तो कभी भी अपने देश का बुरा नहीं सोचते।।

Tuesday, 23 August 2016

भाई-बहन का प्यार (विनीत मिश्र)

भाई-बहन का प्यार 


       एक बार एक पाँच साल की बच्ची , अपने तीन साल के भाई को गोद में लेकर पहाड़ के कठिन और थका देने वाले रास्ते पर चल रही थी. उस लड़की के पीछे पीछे एक महात्मा जी भी जा रहे थे ,  
    उन्होंने देखा की छोटी बच्ची बहुत ही ज्यादा थक चुकी है और पसीने से तरबतर हो चुकी है , महात्मा जी ने उस छोटी बच्ची से पूछा , कि बेटा आप थक नहीं रहे हो ? 
     उस बच्ची ने जवाब दिया, नहीं , और चुपचाप आगे आगे चलने लगी , 
    महात्मा जी भी उसके पीछे पीछे ही चलने लगे , महात्मा जी से उस लड़की की ये हालत देखी नहीं जा रही थी , तो उन्होंने उससे कहा की अपने भाई को कुछ देर के लिए मेरी गोद में दे दो , 
     बच्ची ने ऐसा करने से मना कर दिया , महात्मा जी ने कुछ दूर चलने के बाद फिर अपना सवाल दोहराया की बेटा आप थक नहीं रहे हो ? उसने फिर जवाब दिया , नहीं। 
      महात्मा जी आश्चर्य में पड़ गए कि ये ऐसा कैसे कर पा रही है, उन्होंने फिर कई बार यही सवाल उस बच्ची से पूछा लेकिन अब वो लड़की महात्मा जी को नजरअंदाज करने लगी थी , 
    उनके साथ होने के बावजूद वो उनकी बातो को अनसुना कर लगे थी , जिस कारण अब महात्मा जी का धैर्य जवाब देने लगा था , और आखिर में थकहार कर महत्मा जी ने गुस्से में आकर , बच्ची से वही सवाल दोबारा पूछा तो , लड़की ने ऐसा उत्तर दिया की महात्मा जी मौन हो गए ,,,,,, 

    उस बच्ची ने उत्तर दिया की ये मेरा भाई है, इसलिए मैं थक नहीं रही हू । इस कहानी को लिखने का कारण सिर्फ इतना सा है की आप सब अपनी बहनो को उचित सम्मान दे और उनके प्रति अपने प्यार को कभी भी कम ना होने दे ||


नम्र बनो कठोर नहीं

एक चीनी सन्त बहुत ही बूढ़े हो गए थे । उन्होंने देखा की अंतिम समय निकट आ गया है, तो अपने सभी भक्तों और शिष्यों को अपने पास बुलाया ।। प्रत्येक...