Thursday, 27 April 2017

रोज दिन की शुरुआत अच्छे मन से कीजीए

कई दिन से मन विचलित था तो अपने आदर्श अब्दुल कलाम जी की जीवनी पढ़ने लगा , एक वाक्य लिखी थी उसमें जो की कलाम जी ने ही बोली है,, वो कहते है कि

जीवन में उतार चढ़ाव बहुत ही जरुरी हैं ।  इसके बिना जीवन बेकार है,, अगर गम नही होगा तो खुशियों के आने का अनुभव हमको कैसे होगा?? और वो कहते है कि कोई व्यक्ति यदि icu में admit है । तो monitor पर उसकी जीवन रेखा में उतार चढ़ाव बहुत ही जरुरी है । जीवन रेखा में यदि उतार चढ़ाव ना हो तो वो मृत्यु का ही सूचक है ।।

कभी कभी हमको लगता है कि हमारे जीवन में बड़ा ही संघर्ष है । बड़ी परेशानी है तो सिर्फ एक बात ही मैं कहना चाहता हूं आपसे ,  की जीवन जीना एक cycle चलाने के समान ही है । और जैसे cycle को balance करने के लिए उसको चलाते रहना जरूरी है उसी तरह से जीवन को सुखमय बनाने के लिए जीवन की सभी परेशानियों का सामना करना बहुत ही जरुरी है ।।

तो खुश रहिये हमेशा और सारे संघर्षो को अनुभव में बदलते रहिये और जीवनपथ पर आगे बढ़ते रहिये हमेशा ।।

Wednesday, 15 March 2017

Unity

एक विशाल बरगद के पेड़ पर भांति भांति के पक्षी और जन्तु निवास करते थे.. हंस, कौए, कोयल, गिलहरी, बंदर आदि.. सबने अपनी अपनी डाली और टहनी चुन ली थी... सबका अपना अपना रहन सहन, खाना पीना पर सभी साथ साथ हँसी खुशी रहते थे... एक दूसरे के सुख दुख के साथी।

एक दिन एक लकड़हारा पेड़ काटने आया... पेड़ पर रहने वाले सभी जंतुओं, पक्षियों ने नोचना, चोंच मारना शुरू किया... लकड़हारा भाग खड़ा हुआ, अपने इरादे में सफल नहीं हो सका.. फिर बाद में उसने युक्ति लगाई.. कौए को बुलाकर बोला- हंस हमेशा तुम्हारी खिल्ली उड़ाता रहता है... तुम काले हो, आवाज भी कर्कश है... गंदगी खाते हो... कोयल भी तुम्हारी आवाज की खिल्ली उड़ाती है।

फिर हंस को अलग बुलाकर बोला - कौआ और कोयल तुमसे जलते हैं... तुम्हारा बेदाग सफेद रंग उनसे बर्दाश्त नहीं होता।

इसी तरह सभी एक दूसरे से जलने लगे और उनका व्यवहार सिर्फ अपनी डाल, अपनी टहनी तक सीमित रह गया।

लकड़हारा फिर आया... अबकी बार उसने एक डाल, जिस पर हंस रहते थे, काटनी शुरू की... हंस छटपटाए लेकिन बाकी पक्षी अपनी अपनी डाल पर इत्मीनान के साथ अपनी दिनचर्या में लगे रहे... लकड़हारे ने हंसों को भगा दिया और वो डाल काट डाली।

इसी तरह उसने एक एक कर सारी डालियाँ काट डालीं... अब वो पेड़ ठूँठ खड़ा है, न डाली, न पक्षी। इस इंतज़ार में कि कब उसे जड़ से ही काट दिया जाएगा...

जानते हैं वो पेड़ कौन है???

वो है हिंदुत्व...

आज हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ , सिख, मराठा, जैन, बनियाँ, बौद्ध, यादव, जाट, गूजर, पटेल आदि आदि न जाने कितनी शाखाओं में बँट गये हैं... धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, न जाने क्या क्या आधार बना लिये हैं अपने इस बँटवारे के लिए। अलग अलग अपनी अपनी शाखा तक सीमित... हम दुनियाँ से जितना जुड़ते गए, "अपनी" दुनियाँ उतनी ही सीमित होती गई। जड़ और तने पर किसी का ध्यान ही नहीं !!!

Sunday, 23 October 2016

कदम तो राखो काशी में तर जाओगे काशी में

      कदम तो राखो काशी में तर जाओगे काशी में 


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रंग, भंग और उमंग की नगरी काशी । नित नए उत्सवों , महोत्सवों की काशी । सबको अपना मानने वाली काशी । हजारों रंगो से सराबोर काशी । विश्व की सर्वाधिक पूजनीय नगरी काशी । त्रिशूल पर विराजित काशी ।

              काशी के तो हजारो रंग है जो जिस भावना से काशी को देखता है,, उसको काशी वैसी ही नजर आती है । रामचरितमानस में एक चौपाई  है,, । जाकी रही भावना जैसी , हरि मूरत देखी तिन तैसी
जिसने जिस नजर से काशी को देखा उसको काशी वैसी ही नजर आई,,।
किसी ने काशी को रंग की, तो किसी ने भंग की तो किसी ने उमंग की नगरी कहा ।

काशी को जीतना बहुत आसान है, लेकिन दिल से , सत्य से , प्रेम से , करूणा से,। लेकिन यदि काशी को बल, छल-कपट से जीतना चाहेंगे तो आपका हाल औरंगजेब और रजिया सुल्तान जैसा ही होगा।

जिन्होने काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाकर काशी की अस्मिता को ठेस पहुचानें की पूरी कोशिश की लेकिन काशी की वो कशिश आज भी विद्यमान है ।
काशी तो वो नगरी है जिसने शास्त्रार्थ में शंकराचार्य को भी परास्त किया है।

     काशी में आकर हम काशी की छवि को निहारने में इतने सरावोर हो जाते है खुद कि छवि भी भूल जाते है,, खूसरो कहते है ना कि, अपनी छब बनाई के जो मैं पी के पास गई, छब देखी जब पिया कि तो मैं अपनी भूल गई ।

यही प्रार्थना है उस विधाता से कि काशी की दिव्यता, भव्यता, ओजस्विता ऐसे ही बनी रहे और काशी को निहारने वालों का काशी, को जीने वालों का मेला ऐसे ही लगा रहें।।

जय काशी
हर हर महादेव
भारत माता की जय  

Friday, 21 October 2016

विश्व भरण पोषण कर जोई, ताकर नाम भरत अस होई ।

          भरत और बूढ़ी भिखारिन

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एक भिकारिन की कथा, जिसकी गरिमा ने हैरान कर दिया ।
रत को अक्सर पोस्ट ऑफिस जाना पड़ता था। एक बूढ़ी भिखारिन उस पोस्ट ऑफिस के परिसर में लेटी रहती थी। पोस्ट ऑफिस में घुसने से पहले सार्वजनिक फोन बूथ के पास से ही उसके गंदे कपड़ो की बदबू आती थी। वो सोती नहीं थी तो बड़बड़ाती रहती थी ।

 जब पोस्ट आफिस शाम छ: बजे बंद होने लगता, तो उस बूढ़ी भिखारिन समेत दूसरे आश्रय-विहीन लोगों को वहां से बाहर निकाल दिया जाता।  ऑफिस से निकाले जाने के बाद वह भिखारिन फुटपाथ पर लेट जाती थी। बाहर खुली हवा के कारण उसके पास से बदबू कम आती थी।
 एक दिन अपने जन्मदिन पर उसके यहां बहुत सारा खाना बच गया । वह रात काफी सर्द थी । भरत खाना पैक करके कार से उस सड़क पर पहुँच गया जहां वह बदनसीब बुढ़िया रात को सोती थी। पत्तियां सड़क पर उड़ रही थीं और भरत को पूरी उम्मीद थी कि वह बूढ़ी बदनसीब उसको मिल जाए। आखिरकार वह उसको दिख गई।। उसने वहीं कपड़े पहन रखे थे ,,जो वह हमेशा पहनती थी । गर्मियों में भी उसका बूढ़ा और झुका हुआ शरीर गर्म ऊन की परतों से छिपा हुआ था । अपने दुबले-पतले हाथों से उसने डलिया पकड़ रखी थी । वह पोस्ट ऑफिस के पास वाले खेल के मैदान के सामने तार की बाड़ को पकड़ कर खड़ी थी। भरत ने सोचा कि वह ऐसा जगह क्यों नहीं चुन लेती जहां उसको कम हवां लगे ।। उसे लगा कि शायद हवा से बचने का उपाय उसके दिमाग में कभी आया ही ना हो।

भरत ने अपनी कार रोड़ के किनारे खड़ी कर दी और खिड़की खोलकर कहा अम्मा..क्या आप....। तभी वह सोच में पड़ गया कि अचानक उस बूढ़ीं औरत के लिए उसके मुंह से अम्मा क्यों निकला । लेकिन ना जाने क्यों वह भिखारिन उसको अम्मा जैसी ही लग लग रही थी। 
अम्मा ने एक बार फिर कहां कि अम्मा मैं आपके लिए खाना लाया हूँ क्या आप खाना पसंद करेंगी ? यह सुनकर उस बूढ़ी भिखारन ने भरत की ओर हैरानी से देखा और फिर उसके होठ हिले और वह बहुत स्पष्टता से बोली- अरे बेटा तेरा बहुत-बहुत घन्यवाद कि तू मेरे लिए खाना लेकर आया लेकिन अभी मेरा पेट भरा है,, तू किसी दूसरे जरूरतमंद को ये खाना क्यों नहीं दे देता ???

उसके शब्द स्पष्ट थे और उसका व्यवहार गरिमापूर्ण था । फिर उसने भरत को जाने की इजाजत दे दी और अपना सिर एक बार फिर चीथड़ों में छिपा लिया । भरत हैरान नजरों से उसे काफी देर तक टकटकी लगाए देखता रहा।

संतोष से बढ़कर जीवन में कोई सुख नहीं होता है ।

Tuesday, 18 October 2016

    सर्कस का उत्साह और पिता की नेकी

     


यह काजल की कहानी है,जिसने सर्कस के बदले कुछ और देखा
काजल सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसके पिता एक चीनी मिल में इंजीनियर थे। उन्हें अपनी बेटी के साथ रहने का काफी कम समय मिल पाता था। उस दिन रविवार था और शहर में सर्कस लगा हुआ था। काजल ने कभी भी सर्कस नहीं देखा था, औऱ वो कई दिनों से अपने पिता से सर्कस दिखाने की जिद कर रही थी। उस दिन उसके पिता का अवकाश था। इसलिए अपनी बेटी का मन रखने के लिए वो उसको सर्कस दिखाने लेकर गए।

काजल के पिता टिकट खरीदने गए तो काजल भी अपने पिता के साथ टिकट खिड़की के समीप ख़ड़ी थी,,।। उनके पास ही एक बड़ा सा परिवार भी खड़ा था,, जिसमें दो लड़कियां और छ: लड़के थे। उनके माता पिता सबसे आगे एक दूसरे का हाथ पकड़ कर खड़े थे। उनको देखकर साफ कहा जा सकता था कि वे एक दूसरे की ताकत थे। सभी बच्चें सर्कस देखने के लिए काफी उत्साहित थें। और उनकी बातों से साफ लग रहा था कि वे भी काजल की तरह ही पहली बार सर्कस देखने आए है। कोई कह रहा था कि जोकर हाथी को चलाता है तो कोई कह रहा था कि जोकर सिर्फ साईकिल चलाता है। काजल और उसके पिता उनकी बातें सुनकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

आखिरकार टिकट खिड़की पर उनकी बारी आ ही गई। आठ बच्चों के पिता ने कहा आठ बच्चों के और छ: और दो बड़ो के । खिड़की पर खड़े शख्स ने पैसे बताए। पैसे सुनते ही बच्चों काी मांँ  ने पिता का हाथ छोड़ दिया । वह परेशान अपने पति की ओर देखने लगीं। पिता ने एक बार फिर से लेकिन इस बार थोड़ी मायूस आवाज में पूछा जी कि.. कितना बताया  ’? एक बार फिर काउंटर पर बैठे शख्स से पैसे बताए। पिता का मुँह उतर गया।

 वह पलटकर अपने बच्चों की तरफ देखने लगा और सोचने लगा कि उन्हें कैसे बताए कि उसके पास पैसे कम है। काजल के पिता ने काजल की तरफ देखा और धीरे  से सौ रूपए का नोट पास में जमीन पर गिरा दिया। ऐसा  कतई नहीं था कि उनके पास बहुत पैसे थे। लेकिन उन बच्चों की खुशी के मोल को आगे पैसों का मोल कम पड़ गया था। काजल के पिता उन बच्चों के पिता से बोले कि शायद आपके कुछ पैसे गिर गए है।  ’बच्चों के पिता समझ गए ।

उन्होनें वह नोट उठाया और काजल के पिता का हाथ पकड़कर उनकी तरफ रूआंसी आंखो से देखते हुए बोले ‘  शुक्रिया काजल और उसके पिता मुस्कराते हुए वापस अपनी गाड़ी की तरफ लौट गए । काजल उस दिन सर्कस तो नहीं देख पाई लेकिन उस दिन जो उसने देखा, वह उसके जीवन की अब तक की सबसे बड़ी सीख थी।



खुशियां दूसरों के साथ बांटने से और बढ़ जाती हैं ।।

Tuesday, 11 October 2016

दर्द खत्म नही होता।

अनुभूतियां कभी खत्म नही होतीं,, चाहे वो अच्छी हो या बुरी... जो यादें जो लोग एक बार जहन में, दिल में, मन में जगह बनाने में सफल हो जाते हैं।। उनको भूलना असंभव सा लगता हैं,, ।। कोई कितना भी कठोर दिल क्यों ना हो अगर उसका सच में किसी से सच्चा लगाव है, तो वो उससे बिछड़ने की बातों को सोचकर ही पागल सा होने लगता है,, और अगर उसके सामने वाला भी ठीक उसी प्रकार उसके लिए पागल हो तो उन दोनों के लिए एक दूसरे को भूलना नामुमकिन हैं।।
लेकिन समय और परिस्थितियां ना जाने कब किसको किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दें, एक ऐसै मोड़ जहां पर उसको उन सारी परिस्थितियों का सामना करना पड़े जिसके बारे में वो सोच भी नहीं सकता था,,।. समय सबसे बलवान होता हैं,, ये बात तो सच है लेकिन समय के साथ चलते हुए भी लोग साथ-साथ रह सकते हैं।। लेकिन अगर किसी का साथी समय के साथ ना चल पाया तो दूसरा उसका हाथ बीच राह में ही छेड़ दे से कहां का न्याय है?
किसी के जीवन भर साथ निभाने की कसम खाने के बाद उसको तड़पने, रोने, धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ देना कहा का न्याय हैं??  मेरा मन किसी पर भी उंगली उठाने का नहीं है लेकिन एक सवाल उससे जरूर है कि जो कभी किसी को उदास भी नहीं देख सकता था, आज ये जानते हुए भी कि उसके चेहरे की प्यारी सी मुस्कान हमेशा के लिए खत्म हो चुकी हैं।। वो खुद भी खत्म हो चुका है।
सिर्फ और सिर्फ दूसरो को ये दिखाने के लिए कि आप की वजह से वो पागल नहीं हुआ है, कभी कभी मुश्कुरा देता हैं,, उसको ये हाल जानकर आपके मन में पीड़ नहीं होती दु:ख नहीं होता।।
बेशक आपका जवाब ना हो लेकिन अगर आप आज जिस किसी के भी साथ हो तो ये सोच लेना कि जो बदलाव आपका अपना पुराने प्यार के प्रति आया है वो क्या इस नए प्रेमी के लिए नहीं आएगा,,क्या इसकी भी सिर्फ एक गलती पर आप उसको भी नहीं हमेशा के लिए नहीं छोड़ दोगे????

Friday, 7 October 2016

नवरात्रि का रहस्य

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        नवरात्रि का रहस्य

नवरात्र शब्द से नव आहोरात्रों (विशेष रात्रियों) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नवरूपों की उपासना की जाती  है। रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। भारत के प्राचीन ऋषि मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है इसलिए दीपावली, होलिका,शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परम्परा है। यदि रात्रि का कोई विशेष महत्व न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कहकर दिनही कहा जाता लेकिन नवरात्र के दिन,नवदिन नहीं कहे जाते। मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार ठीक छ: मास बाद अश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतीपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी  के एक दिन पूर्वतक । परन्तु सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है।

इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं।

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