Sunday, 7 May 2017

नम्र बनो कठोर नहीं

एक चीनी सन्त बहुत ही बूढ़े हो गए थे । उन्होंने देखा की अंतिम समय निकट आ गया है, तो अपने सभी भक्तों और शिष्यों को अपने पास बुलाया ।।
प्रत्येक से बोले --- तनिक मेरे मुँह के अंदर तो देखो भाई कितने दाँत हैं?

प्रत्येक शिष्य इस मुँह के भीतर देखा, प्रत्येक ने कहा -- 'दाँत तो कई वर्ष पहले ही समाप्त हो चुके हैं महाराज ! एक भी दांत नहीं है ।'

संत ने कहा -- 'जिव्हा तो विद्यमान है ?'
सबने कहा -- ' जी हां ।'

संत ने कहा --- ' यह बात कैसे हुई ? जिव्हा तो जन्म समय भी विद्यमान थी । दांत उससे बहुत  पीछे आए । पीछे आने वाले को पीछे जाना चाहिये था ।

ये दांत पहले कैसे चले गए ।'

शिष्यों ने कहा -- ' हम तो इसका कारण समझ नहीं पाते ।'

तब सन्त ने धीमी आवाज़ ने कहा --- ' यही बतलाने के लिए मैंने तुम्हें बुलाया है। देखो !

यह वाणी अब तक विद्यमान है, यह इसलिए की इसमें कठोरता नहीं और ये दांत पीछे आकर पहले इसलिए समाप्त हो गए तो इसलिए की ये बहुत कठोर थे। इन्हें अपनी कठोरता पर अभिमान था ।
यह कठोरता ही इनकी समाप्ति का कारण बनी ।
इसीलिए मेरे बच्चो ! यदि देर तक जीना चाहते हो तो नम्र बनो, कठोर न बनो !!

श्रेष्ठ शिक्षक

उनकी करुणा में कोई कमी है नही, योग्यता में हमारी कमी रह गयी, सूर्य के उगने में कोई कमी है नही, पात्रता में हमारी कमी रह गयी। आप सभी को d...